हाईलाइट्स:
- खाकी पर संगीन आरोप: सिकंदरपुर थाना क्षेत्र के काजीपुर में महिलाओं से मारपीट मामले में १५ दिन बीतने के बाद भी पुलिस ने नहीं दर्ज की विधिक एफआईआर (FIR)।
- IGRS पोर्टल की रिपोर्ट पर सवाल: पीड़ित का आरोप— मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत के बाद हल्का दरोगा ने पुरानी फोटो का इस्तेमाल कर लगाई भ्रामक और गलत रिपोर्ट।
- सुरक्षा की गुहार: पीड़ित हरेराम गोड़ ने विपक्षियों पर लगाया लगातार धमकी देने का आरोप; शासन-प्रशासन से न्याय और विधिक सुरक्षा की मांग।
सिकंदरपुर/बलिया (टुडे९ उत्तरप्रदेश): उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद अंतर्गत सिकंदरपुर थाना पुलिस की कार्यप्रणाली और उनकी विधिक निष्पक्षता एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी जहां एक ओर सूबे में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और 'आईजीआरएस' (IGRS) पोर्टल के जरिए त्वरित न्याय दिलाने का विधिक दावा करते हैं, वहीं सिकंदरपुर पुलिस पर पीड़ित को न्याय देने के बजाय उसे ही प्रताड़ित करने और मामले को दबाने के लिए भ्रामक विधिक रिपोर्ट लगाने का सनसनीखेज आरोप लगा है। मामला सिकन्दरपुर थाना क्षेत्र के काजीपुर गांव का है, जहां महिलाओं के साथ हुई बर्बर मारपीट के १५ दिन बीत जाने के बाद भी अब तक स्थानीय पुलिस द्वारा कोई विधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है।
९ जून को हुई थी महिलाओं से मारपीट, वीडियो भी हुआ था वायरल
प्राप्त विवरण के अनुसार, काजीपुर गांव निवासी पीड़ित हरेराम गोड़ ने टुडे९ उत्तरप्रदेश को अपनी आपबीती बताते हुए आरोप लगाया कि बीते ९ जून २०२६ की सुबह उनके घर की बेटियों और महिलाओं के साथ विपक्षी पक्ष द्वारा जमकर मारपीट की गई थी। इस बर्बरता का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था। पीड़ित का कहना है कि घटना के तुरंत बाद उन्होंने सिकंदरपुर थाने में विधिक तहरीर दी थी। लेकिन १५ दिन से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी पुलिस ने दोषियों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की। पीड़ित का आरोप है कि उल्टा पुलिस ने उन्हें और उनके परिवार को ही थाने में बैठाकर उनका शांतिभंग में चालान कर दिया।
हल्का दरोगा की विधिक रिपोर्ट पर उठे सवाल, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन को गुमराह करने का आरोप
थाने से न्याय न मिलने पर पीड़ित हरेराम गोड़ ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और आईजीआरएस पोर्टल पर विधिक न्याय की गुहार लगाई। आरोप है कि इसके बाद हल्का दरोगा चंद्रशेखर यादव ने मामले में एक ऐसी विधिक रिपोर्ट लगा दी, जिसका मूल आवेदन से कोई लेना-देना ही नहीं है। दरोगा ने अपनी रिपोर्ट में दर्शाया है कि पीड़ित सरकारी खड़ंजे (सड़क) को उखाड़ रहा था, जिसकी वजह से यह मारपीट हुई।
इस पर पीड़ित ने कड़ा प्रतिवाद करते हुए साक्ष्य प्रस्तुत किए कि जिस फोटो को आधार बनाकर पुलिस मामले को रफा-दफा करने का विधिक प्रयास कर रही है, वह वास्तव में साल २०२४ की है। तब जर्जर खड़ंजे को ठीक करने के लिए ग्राम प्रधान अखिलेश गुप्ता से कहने के बावजूद जब काम नहीं हुआ, तो परिवार ने स्वयं मिट्टी भरकर ईंटों को ठीक किया था। पीड़ित का विधिक तर्क है कि खड़ंजा आज भी मौके पर सुरक्षित है। सवाल यह उठता है कि यदि जमीनी विवाद या सरकारी संपत्ति का मामला था भी, तो क्या पुलिस के पास मारपीट और महिला उत्पीड़न की एफआईआर दर्ज न करने का कोई विधिक अधिकार है?
विपक्षियों से जान का खतरा, पीड़ित ने लगाई गुहार
हरेराम गोड़ ने अत्यंत भावुक और विधिक लहजे में शासन-प्रशासन के आला अधिकारियों से न्याय की भीख मांगी है। उन्होंने अंदेशा जताया है कि पुलिसिया उदासीनता के कारण विपक्षी लगातार उनके परिवार को जान-माल की धमकी दे रहे हैं और उनके साथ कभी भी कोई अप्रिय घटना घटित हो सकती है। अब देखना यह है कि बलिया पुलिस के आला अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर पीड़ित परिवार को विधिक न्याय दिलाते हैं या फिर आईजीआरएस पोर्टल पर लगी इस कथित गलत रिपोर्ट को ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है।
