हाईलाइट्स:
- ऐतिहासिक मठ में विवाद: रेवती स्थित सौ बीघे में फैले श्री राम जानकी मठ की संपत्ति पर कब्जा जमाने के लिए रची जा रही है गहरी साजिश।
- ६ साल के मासूमों को मोहरा बनाने का आरोप: भक्तों का दावा— कोर्ट के आदेश को ताक पर रख विभिन्न गुट ५ से ६ साल के बच्चों को महंत बनाने पर आमादा; संरक्षक बनकर संपत्ति हड़पने का खेल।
- आदित्य नारायण तिवारी को महंत बनाने की मांग: परंपरा और रोटेशन के अनुसार अब स्व. रामनारायण तिवारी के परिवार की है बारी; पौत्र के समर्थन में उतरे क्षेत्रीय भक्त व साधु-संत।
मझौवाँ/रेवती (टुडे९ उत्तरप्रदेश): उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद अंतर्गत रेवती क्षेत्र से एक बेहद हैरान करने वाला और सनसनीखेज मामला सामने आ रहा है। अपनी सदियों पुरानी आध्यात्मिक विरासत और गौरवशाली इतिहास के लिए विख्यात श्री राम जानकी मठ इस समय गंभीर विवादों, आपसी रंजिश और घोर उपेक्षा के दौर से गुजर रहा है। सौ बीघे की विशाल व बहुमूल्य साम्राज्य वाली इस धार्मिक संपत्ति पर अपना वर्चस्व और कब्जा स्थापित करने के लिए विभिन्न गुटों द्वारा ५ और ६ वर्ष के मासूम बच्चों को महंत बनाने की कोशिश की जा रही है, जिससे स्थानीय भक्तों, ग्रामीणों और साधु-संतों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
क्या है १९३५ का ऐतिहासिक हाई कोर्ट का फैसला?
इस विवाद की विधिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वर्ष १९३५ में अपील संख्या २२० के तहत इस ऐतिहासिक मठ को लेकर एक बेहद स्पष्ट और ऐतिहासिक निर्णय दिया था। इस विधिक निर्णय के अनुसार, श्री राम जानकी मठ का महंत केवल और केवल मझौवाँ के तीन विशिष्ट 'तिवारी परिवारों' में से ही कोई ऐसा बालक या युवा बन सकता है, जो पूर्ण रूप से संन्यास ग्रहण करे और आजीवन अविवाहित रहकर मठ की सेवा करे।
मासूम बच्चों को 'मोहरा' बनाकर संपत्ति के दुरुपयोग की मंशा!
स्थानीय प्रबुद्ध जनों और भक्तों का सीधा आरोप है कि मठ से जुड़े कुछ स्वार्थी तत्वों और विभिन्न गुटों द्वारा लोभ-लालच में आकर इस पवित्र गद्दी का राजनीतिकरण और बाजारीकरण किया जा रहा है। इसके तहत ५ और ६ वर्ष के अबोध बालकों को महंत घोषित करने का प्रपंच रचा जा रहा है। आलोचकों और क्षेत्रीय जनता का कहना है कि ६ साल का एक मासूम बच्चा जो खुद को संभालने में असमर्थ है, वह मठ के इतने बड़े प्रशासनिक, विधिक और आध्यात्मिक दायित्वों का निर्वहन कैसे कर सकता है? इसके पीछे की असली मंशा इन बच्चों को महज एक 'लीगल मोहरा' बनाना है, ताकि उनके कानूनी संरक्षक (गार्डियन) बनकर मठ की सौ बीघे की अरबों की बेनामी संपत्ति और आय का अपनी मर्जी से दुरुपयोग किया जा सके।
रोटेशन के आधार पर अब स्व. रामनारायण तिवारी के परिवार की है बारी
परंपरा और पूर्व में तीनों तिवारी परिवारों के बीच लिखित व मौखिक रूप से हुई विधिक सहमति के अनुसार, रोटेशन (बारी-बारी) के आधार पर महंत बनाने की अटूट व्यवस्था तय की गई थी। इस व्यवस्था के तहत दो परिवारों के सदस्य पूर्व में सम्मानपूर्वक महंत पद की जिम्मेदारी निभा चुके हैं, परंतु तीसरा परिवार यानी स्वर्गीय रामनारायण तिवारी का परिवार अब तक इस सेवा और अधिकार से पूरी तरह वंचित रहा है।
क्षेत्रीय भक्तों, सनातन धर्मावलंबियों और साधु-संतों का स्पष्ट मानना है कि न्याय और स्थापित परंपरा के अनुसार अब अगली बारी केवल और केवल स्व. रामनारायण तिवारी के परिवार की ही बनती है। इसी लोकतांत्रिक और पारंपरिक मांग को देखते हुए स्थानीय भक्तों व क्षेत्रीय लोगों ने एकजुट होकर स्व. रामनारायण तिवारी के योग्य पौत्र आदित्य नारायण तिवारी को मठ का अगला महंत बनाने की मांग को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है।
पारदर्शिता पर सवाल, आय-व्यय का कोई लेखा-जोखा नहीं
विवादों के बीच सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह ऐतिहासिक धार्मिक स्थल वर्षों से घोर प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है। सौ बीघे में फैले इस विशाल परिसर में न तो कोई नया विकास कार्य हुआ है और न ही सुंदरीकरण, जिससे इसके वैभव को ग्रहण लग रहा है। इसके अलावा, वर्षों से मठ की विशाल आय और खर्च का कोई भी स्पष्ट और सार्वजनिक लेखा-जोखा (ऑडिट) सामने नहीं आया है, जिससे वर्तमान प्रबंधन की पारदर्शिता पर भी बहुत बड़े वित्तीय सवाल खड़े हो रहे हैं। भक्तों ने चेतावनी दी है कि यदि मठ का वैभव लौटाने और पारदर्शिता बहाल करने के बजाय इसे निजी जायदाद की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश बंद नहीं हुई, तो वे बड़े आंदोलन के लिए विवश होंगे। अब देखना यह होगा कि बलिया जिला प्रशासन इस संवेदनशील और धार्मिक मामले में क्या हस्तक्षेप करता है।
