हाईलाइट्स:
- हाईकोर्ट से बड़ी राहत: ग्राम शीतल दवनी निवासी अधिवक्ता कैश कुमार सिंह व अन्य को मिली बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने निरस्त किया 5 साल पुराना मुकदमा।
- साजिश का पर्दाफाश: गांव के ही विरोधियों के दबाव में वादिनी ने दर्ज कराया था केस, बाद में कोर्ट में शपथ पत्र देकर कबूल की झूठे मुकदमे की सच्चाई।
- भूमि विवाद बनी वजह: दीवानी अदालत में चल रहे विजय सिंह बनाम कैलाश के जमीन विवाद में रंजिश निकालने के लिए कानून का किया गया था दुरुपयोग।
बांसडीह रोड/बलिया (रोहित सिंह ): जनपद के एक बहुचर्चित मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पांच वर्ष पुराने छेड़खानी के मुकदमे को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया है। पांच सालों से चल रही लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट के इस बड़े हस्तक्षेप से आरोपित बनाए गए निर्दोष लोगों को बड़ी राहत मिली है। न्यायालय के इस निर्णय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि व्यक्तिगत या भूमि रंजिश निकालने के लिए कानून का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2021 में दर्ज हुआ था मुकदमा, अधिवक्ता ने दी थी चुनौती
पूरा मामला बांसडीह रोड थाना क्षेत्र के ग्राम शीतल दवनी से जुड़ा है, जहाँ वर्ष 2021 में छह लोगों के खिलाफ छेड़खानी सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में मुकदमा अपराध संख्या 116/2021 दर्ज कराया गया था। आरोपितों में शामिल स्थानीय अधिवक्ता कैश कुमार सिंह ने शुरू से ही इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और मनगढ़ंत बताया था। उनका प्रबल तर्क था कि कथित घटना के समय वे बलिया कचहरी में अपने पेशेवर दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे, जिसकी पुष्टि न्यायालय परिसर के सीसीटीवी फुटेज से भी की जा सकती थी।
पुनः विवेचना और वादिनी के शपथ पत्र से खुली मामले की परतें
इस मामले की विवेचना के दौरान कई मोड़ आए। प्रारंभिक आरोप पत्र में पुलिस ने छह में से चार लोगों को नामजद किया था, लेकिन आरोपितों के आवेदन पर जब मामले की पुनः विवेचना कराई गई, तो सच सामने आने लगा। असल में इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ एक भूमि विवाद था, जो दीवानी न्यायालय बलिया में 'विजय सिंह बनाम कैलाश' के बीच लंबे समय से लंबित है। मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब खुद वादिनी ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय (JM-II) की अदालत में एक शपथपत्र दाखिल कर पूरी सच्चाई बयां कर दी। वादिनी ने कोर्ट में स्वीकार किया कि गांव के ही मुकेश कुमार सिंह और निशांत सिंह की अधिवक्ता कैश कुमार सिंह से रंजिश थी, जिसके चलते उनके दबाव में आकर यह झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया था।
हाईकोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत रद्द की एफआईआर
इस घोर अन्याय के खिलाफ अधिवक्ता कैश कुमार सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत याचिका संख्या 17091/2026 दाखिल कर एफआईआर को चुनौती दी थी। बीते 16 जुलाई 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों, वादिनी के शपथ पत्र और न्यायिक दस्तावेजों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद उक्त एफआईआर को पूरी तरह निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया। पाँच साल बाद मिली इस न्याय की जीत से पीड़ित पक्ष में हर्ष का माहौल है, वहीं क्षेत्र के कानूनी जानकारों का कहना है कि यह निर्णय न्याय व्यवस्था में आम आदमी के विश्वास को और सुदृढ़ करता है।
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