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बलिया का बंकवा गांव बना ऐतिहासिक केंद्र; पोखरे की खुदाई में मिली २२०० साल पुरानी दीवार और तीन कालखंडों के दुर्लभ अवशेष, पुरातत्व विभाग ने की पुष्टि


 हाईलाइट्स:

• ऐतिहासिक महाखोज: बलिया के बांसडीह क्षेत्र अंतर्गत बंकवा गांव में पोखरे के सुंदरीकरण के दौरान जमीन से २० फीट नीचे मिली ६० फीट लंबी प्राचीन दीवार।

• तीन संस्कृतियों का संगम: पुरातत्व विभाग की जांच में शुंग काल, कुषाण काल और गुप्त कालीन सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों व अवशेषों की हुई पुष्टि।

• राष्ट्रीय पटल पर आएगा नाम: क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. राम नरेश पाल शासन को भेजेंगे विस्तृत रिपोर्ट; स्थल को संरक्षित घोषित करने की तैयारी।

बांसडीह/बलिया (टुडे९ उत्तरप्रदेश): उत्तर प्रदेश का बागी बलिया जनपद अब अपने क्रांतिकारी इतिहास के साथ-साथ अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली सभ्यता के एक नए वैश्विक केंद्र के रूप में उभरने जा रहा है। जिले के बांसडीह विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत बंकवा गांव में एक पोखरे की खुदाई के दौरान मिले प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों ने देश के इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को चौंका दिया है। उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग की विशेषज्ञ टीम द्वारा किए गए हालिया सर्वे और वैज्ञानिक विश्लेषण में इस स्थल को लगभग २२०० साल पुरानी मानव सभ्यता का गवाह बताया गया है, जो सीधे तौर पर मौर्योत्तर और गुप्त साम्राज्य की समृद्धि को प्रमाणित करता है।

जमीन से २० फीट नीचे मिली ६० फुट लंबी रहस्यमयी दीवार

प्राप्त विवरण के अनुसार, लगभग दो सप्ताह पूर्व बंकवा गांव में एक स्थानीय पोखरे (तालाब) की खुदाई और सुंदरीकरण का कार्य चल रहा था। इसी दौरान मजदूरों को जमीन से करीब २० फीट की गहराई पर ईंटों की एक विशाल प्राचीन संरचना दिखाई दी। कौतूहलवश जब और सफाई की गई, तो वहां लगभग ६० फुट लंबी एक मजबूत दिवालनुमा संरचना उभर कर सामने आई। इस अद्भुत खोज की खबर पूरे क्षेत्र में जंगल की आग की तरह फैल गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय क्षेत्रीय विधायक केतकी सिंह ने तत्काल शासन स्तर पर संपर्क साधा और उनके विशेष आग्रह व सक्रियता के बाद उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग की एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ टीम ने बंकवा गांव पहुंचकर स्थल का गहन निरीक्षण किया।

बीएचयू के विशेषज्ञों ने खोजे तीन प्रमुख कालखण्डों के साक्ष्य



क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. राम नरेश पाल के कुशल नेतृत्व में बंकवा पहुंची इस विशेषज्ञ टीम में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के भारत कला भवन के पूर्व निदेशक डॉ. वेद प्रकाश शर्मा और वरिष्ठ फोटोग्राफर राजीव रंजन शामिल रहे। इसके अलावा, बलिया के स्थानीय इतिहासकार डॉ. अमृत आनंद सिन्हा और जितेंद्र सिंह झमन ने भी टीम के साथ क्षेत्र के भौगोलिक इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियां जोड़ीं।

विशेषज्ञों ने जब खुदाई स्थल से प्राप्त प्राचीन मिट्टी के बर्तनों (पोटरी), ईंटों के आकार और कलाकृतियों का बारीकी से अध्ययन किया, तो पाया कि यह स्थान तीन महान कालखण्डों की गवाही देता है:

1. शुंग काल (가장 प्राचीन): यहां मिले सबसे पुराने और बेहद दुर्लभ अवशेष शुंग वंश के समय के हैं, जो इस इलाके की प्राचीनता को २२०० साल पीछे ले जाते हैं।

2. कुषाण काल: इस काल के अवशेष दर्शाते हैं कि प्राचीन समय में यह क्षेत्र एक समृद्ध व्यापारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।

3. गुप्त काल (स्वर्ण युग): गुप्त कालीन साक्ष्य यह प्रमाणित करते हैं कि यहां मानव सभ्यता का विकास लगातार कई शताब्दियों तक बिना रुके सुचारू रूप से चलता रहा।

शासन को भेजी जाएगी रिपोर्ट, व्यवस्थित खुदाई से खुलेगा इतिहास का राज



निरीक्षण के बाद क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. राम नरेश पाल ने बताया कि बंकवा गांव में मिली यह दीवार और अवशेष कोई सामान्य ढांचा नहीं है, बल्कि यह एक बेहद समृद्ध प्राचीन नगरीय या धार्मिक सभ्यता का हिस्सा है। टीम अब इस पूरे स्थल का एक विस्तृत ब्यौरा, फोटोग्राफिक साक्ष्य और पुरातात्विक रिपोर्ट तैयार कर उत्तर प्रदेश शासन और महानिदेशक पुरातत्व को भेजने जा रही है। इस रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य इस पूरे ऐतिहासिक स्थल को 'राज्य संरक्षित क्षेत्र' घोषित करवाना है, ताकि यहां किसी भी प्रकार का अवैध अतिक्रमण न हो और भविष्य में भारत सरकार के सहयोग से एक बड़े पैमाने पर सुव्यवस्थित व वैज्ञानिक खुदाई (Excavation) को बढ़ावा दिया जा सके।

बंकवा गांव की यह चमत्कारी खोज बलिया के प्राचीन वैभव और ऐतिहासिक इतिहास को वैश्विक पटल पर पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगी। यदि यहां सुनियोजित तरीके से शोध और उत्खनन का कार्य आगे बढ़ता है, तो उत्तर प्रदेश और भारत के पुरातात्विक मानचित्र पर बलिया के बंकवा का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होना तय है।

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