हाईलाइट्स:
- फाइलों में दबा आदेश: जिलाधिकारी बलिया द्वारा मुकदमा दर्ज करने के स्पष्ट निर्देश के एक महीने बाद भी ग्राम पंचायत अधिकारी कु० सोनम के खिलाफ नहीं हुई प्राथमिकी।
- क्या था वायरल ऑडियो: 9 जून को सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी ग्राम पंचायत अधिकारी और ग्राम प्रधान प्रतिनिधि के बीच की कथित बातचीत, बीडीओ ने की थी पुष्टि।
- विभागीय लापरवाही उजागर: डीपीआरओ के बार-बार पत्र जारी करने के बाद भी ठंडे बस्ते में रहा मामला, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और ढिलाई पर खड़े हो रहे गंभीर सवाल।
बेल्थरा रोड/बलिया (रोहित सिंह ): सियर विकास खंड के अंतर्गत सरायडीह ग्राम पंचायत का बेहद चर्चित और संवेदनशील 'वायरल ऑडियो' मामला उच्चाधिकारियों के कड़े रुख के बावजूद फाइलों में ही दबकर दम तोड़ता नजर आ रहा है। जिलाधिकारी बलिया द्वारा आरोपी ग्राम पंचायत अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के स्पष्ट आदेश के एक माह बीत जाने के बाद भी अब तक प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की जा सकी है। प्रशासन की इस सुस्त और सुस्त रवैये वाली कार्यप्रणाली पर अब क्षेत्र में गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
9 जून को वायरल हुआ था कथित बातचीत का ऑडियो क्लिप
विदित हो कि बीते 9 जून 2026 को सोशल मीडिया पर एक कथित ऑडियो क्लिप बड़ी तेजी से वायरल हुई थी, जिसमें सियर विकास खंड के सरायडीह की ग्राम पंचायत अधिकारी कु० सोनम और ग्राम प्रधान प्रतिनिधि के बीच की बातचीत रिकॉर्ड थी। इस ऑडियो के सार्वजनिक होने के बाद मचे हड़कंप के बीच खंड विकास अधिकारी (BDO) सियर द्वारा इसकी गहनता से जांच की गई थी। बीडीओ की आधिकारिक जांच रिपोर्ट में इस वायरल ऑडियो की पुष्टि भी हुई थी।
जिलाधिकारी व डीपीआरओ के कड़े निर्देशों की भी हुई अनदेखी
मामले की गंभीरता और भ्रष्टाचार के आरोपों को देखते हुए जिलाधिकारी बलिया ने बीते 17 जून 2026 को ही सुसंगत धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराने का कड़ा अनुमोदन दिया था। इसी क्रम में जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) बलिया ने भी 19 जून और 20 जून को लगातार पत्र जारी कर सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) सियर को तत्काल प्रभाव से सुसंगत धाराओं में FIR दर्ज कराने का कड़ा निर्देश दिया था।
आखिर किसके दबाव में रुकी है विधिक कार्रवाई?
डीएम और डीपीआरओ जैसे उच्चाधिकारियों के लिखित व स्पष्ट निर्देश के बावजूद पूरे एक महीने का समय बीत चुका है, लेकिन सियर ब्लॉक प्रशासन और संबंधित विभाग मामले में कुंडली मारकर बैठा हुआ है। अब तक एफआईआर दर्ज न होना सीधे तौर पर घोर विभागीय लापरवाही और मिलीभगत की ओर इशारा करता है। इस ढिलाई ने अब यह बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर किसके राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव में उच्चाधिकारियों के इस जनहितकारी निर्देश की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं?
