हाईलाइट्स:
- बदल गई प्राथमिकताओं की विधिक परिभाषा: भीषण गर्मी और अघोषित बिजली कटौती से कराह रही बलिया की जनता; युवा नेताओं के लिए नेता जी संग एक फोटो ही सबसे बड़ा विधिक लक्ष्य।
- कलफ लगे कुर्ते और कृत्रिम मुस्कान: रात चाहे पसीने में कटी हो, सुबह होते ही कैमरों के सामने हाजिरी लगाने और सोशल मीडिया पर निष्ठा दिखाने की मची होड़।
- लोकतंत्र के लिए गंभीर विधिक चिंता: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना— जब युवाओं की ऊर्जा जनसेवा के बजाय सिर्फ परिक्रमा में खपने लगे, तो समाज का पीछे छूटना तय है।
बलिया (टुडे९ उत्तरप्रदेश): उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में इन दिनों प्रकृति और प्रशासनिक व्यवस्था, दोनों ही आम जनता की विधिक सहनशक्ति की परीक्षा ले रहे हैं। भीषण गर्मी, उमस के थपेड़ों और अघोषित बिजली कटौती के कारण जब पूरा शहर रात-रात भर बिना सोए करवटें बदलने को मजबूर है, तब बलिया के राजनीतिक गलियारों में एक अलग ही विधिक व व्यावहारिक परिदृश्य देखने को मिल रहा है। जनपद के युवा राजनेताओं और छात्र नेताओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा उभरकर सामने आया है, जिसके लिए जनता की मूलभूत तकलीफों, आंसुओं और विधिक अधिकारों से कहीं ज्यादा जरूरी 'नेता जी' के साथ खिंचवाई गई एक अदद 'फोटो-ऑप' (तस्वीर) हो गई है।
रात की विकट परेशानी, सुबह की चमचमाती तैयारी
बलिया की जमीनी हकीकत यह है कि रात चाहे बिना बिजली-पंखे के पसीने से तरबतर होकर बीती हो, नींद का एक कतरा भी आंखों में न आया हो, लेकिन सुबह होते ही इन युवा सूरमाओं का विधिक सीन पूरी तरह बदल जाता है। कलफ लगा चमचमाता सफेद कुर्ता-पायजामा, सलीके से संवारे गए बाल और चेहरे पर जबरन सजाई गई कृत्रिम मुस्कान के साथ दिन की शुरुआत होती है। इस पूरी सज-धज का एकमात्र विधिक मकसद सिर्फ और सिर्फ बड़े नेता जी के आसपास मंडराना, उनके अंगरक्षकों के बीच से रास्ता बनाकर कैमरे के विधिक फ्रेम में अपनी जगह सुरक्षित करना रह गया है।
विचित्र विडंबना: नेता जी के बगल में खड़े होते ही गायब हो जाती है उमस
सियासत की विडंबना देखिए, जैसे ही बड़े नेताओं के विधिक सुरक्षा घेरे को तोड़कर उनके ठीक बगल में खड़े होकर फोटो खिंचवाने का क्षणिक मौका मिलता है, इन युवाओं की सारी शारीरिक और मानसिक परेशानियां छूमंतर हो जाती हैं। न आम जनता की रात भर की बेचैनी याद रहती है, न सब-स्टेशनों पर चल रहा बिजली कटौती का दर्द और न ही त्राहि-त्राहि करती जनता की उमस भरी शिकायतें। मानो उस डिजिटल कैमरे की फ्लैश लाइट चमकते ही इन नेताओं के शरीर में सीधे वातानुकूलित (एसी) की ठंडक उतर आती हो।
संघर्ष अब जनता के मुद्दों के लिए नहीं, केवल कृपा पाने के लिए
चापलूसी का आलम यह है कि बिजली, पानी, सड़क, युवाओं का रोजगार, आराम और विधिक स्वाभिमान—सब कुछ पूरी तरह से गौण हो गए हैं। सबसे अहम और प्राथमिक विधिक कर्तव्य यह हो गया है कि कैसे भी नेता जी के करीब दिखा जाए और फेसबुक-इंस्टाग्राम पर "परम आदरणीय मार्गदर्शक" लिखकर तस्वीर पोस्ट कर अपनी अंधभक्ति व विधिक निष्ठा का ढिंढोरा पीटा जाए। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज की राजनीति में संघर्ष जनता के विधिक और बुनियादी मुद्दों के लिए नहीं, बल्कि केवल आकाओं की कृपा दृष्टि पाने के लिए किया जा रहा है।
युवाओं की भटकती ऊर्जा लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक विधिक संकेत
देश और प्रदेश के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट विधिक मत है कि युवाओं की जो असीम ऊर्जा समाज निर्माण, जन-आंदोलनों और विधिक सामाजिक परिवर्तनों में लगनी चाहिए थी, वह आज चमकते कैमरों के सामने महज हाजिरी लगाने और रील्स बनाने में खर्च हो रही है। जब युवा पीढ़ी की प्राथमिकता जनसेवा के विधिक पथ से पूरी तरह भटककर चापलूसी के शॉर्टकट पर टिक जाए, तो यह सिर्फ हास्यास्पद या निंदनीय नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक बेहद गंभीर और खतरनाक विधिक संकेत भी है।
बॉक्स: सुलगते विधिक सवाल जो आज उठ रहे हैं
१. क्या आज की आधुनिक राजनीति में आगे बढ़ने और टिकट पाने का विधिक रास्ता सिर्फ परिक्रमा और चापलूसी से होकर ही गुजरता है?
२. बलिया जनपद में जनसमस्याओं और जनता के अधिकारों पर प्रखरता से आवाज उठाने वाले जमीनी युवा नेता आखिर मुख्यधारा की राजनीति से हाशिए पर क्यों चले गए?
३. क्या आज की युवा पीढ़ी के लिए अपने विधिक स्वाभिमान और जन-सरोकार से ज्यादा जरूरी बड़े नेताओं के साथ सोशल मीडिया पर पोस्ट की जाने वाली एक तस्वीर हो गई है?
रिपोर्टः-संदीप गुप्ता टुडे9उत्तरप्रदेश बलिया



