हाईलाइट्स:
- अस्तित्व की विधिक लड़ाई: उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद की आवासीय योजना के खिलाफ डाडी, रेवरीडीह, शहरोज, मेघई और मुहम्मदपुर शहरोज के किसान लामबंद।
- अधिग्रहण कानून का उल्लंघन: किसानों का गंभीर आरोप— भूमि अधिग्रहण कानून २०१३ के विधिक नियमों को ताक पर रखकर बिना सहमति कौड़ियों में ली जा रही जमीन।
- मंचों पर आय दोगुनी, जमीन पर छलावा: ४५ डिग्री की तपिश में पेट भरने वाला अन्नदाता अपने ही खेत पर बेगाना होने को मजबूर; नगर विकास मंत्री से लगाई विधिक गुहार।
मऊ (टुडे९ उत्तरप्रदेश): उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद में "विकास" और "आवास" के नाम पर कंक्रीट के जंगल खड़े करने की प्रशासनिक पटकथा के बीच, जमीन की रक्षा के लिए अन्नदाताओं की विधिक चीखें गूंजने लगी हैं। यूपी आवास विकास परिषद द्वारा मऊ के पांच प्रमुख ग्रामीण अंचलों में प्रस्तावित आवासीय योजना के तहत किए जा रहे भूमि अधिग्रहण ने किसानों के विधिक अधिकारों और उनके अस्तित्व पर एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पीढ़ियों से पसीना बहाकर मिट्टी से सोना उगाने वाले किसान आज अपनी ही पुरखौती संपत्तियों को बचाने के लिए दर-दर भटकने को विवश हैं।
५ गांवों की विधिक जमीन दांव पर, खरबों के व्यापार का आरोप
प्राप्त आधिकारिक व जमीनी विवरण के अनुसार, मऊ जिले के डाडी, रेवरीडीह, शहरोज, मेघई और मुहम्मदपुर शहरोज गांवों की सैकड़ों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि इस योजना की जद में आ रही है। यह महज कागजी आरजी नंबर नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के विधिक जीवनयापन का एकमात्र जरिया है। किसानों का सीधा आरोप है कि उनके साथ विधिक छल किया जा रहा है। जिस जमीन को कौड़ियों के भाव अधिग्रहित किया जा रहा है, उसी पर भविष्य में निजी बिल्डर्स और कॉर्पोरेट घराने करोड़ों-अरबों के विधिक कॉमर्शियल प्रोजेक्ट और फ्लैट्स बनाकर खरबों का व्यापार करेंगे, जबकि असली मालिक अपनी ही मेड़ पर बेगाना रह जाएगा।
अधिग्रहण कानून २०१३ की विधिक अनदेखी और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी
मामले में सबसे बड़ा विधिक पेच यह है कि वर्ष २०१३ के केंद्रीय भूमि अधिग्रहण कानून के विधिक प्रावधानों, जिसमें बाजार भाव का ४ गुना मुआवजा, अनिवार्य जनसुनवाई और कम से कम ८० फीसदी किसानों की लिखित सहमति आवश्यक है, का पूरी तरह उल्लंघन किया जा रहा है। वर्तमान में घोसी विधानसभा सीट विधायक विहीन होने के कारण किसानों की राजनीतिक विधिक आवाज दबा दी गई है। हालांकि, हताश होकर किसानों ने नगर विकास मंत्री ए.के. शर्मा से भेंट की, जिन्होंने माननीय मुख्यमंत्री को विधिक जांच हेतु पत्र प्रेषित किया है, परंतु स्थानीय जिला प्रशासन और जिलाधिकारी द्वारा अब तक किसानों की विधिक फरियाद को सीधे तौर पर नहीं सुना गया है।
विस्थापित होने की कगार पर किसान, प्रशासन के सामने रखीं ४ विधिक मांगें
कल तक जो किसान पूरे प्रदेश का पेट भरते थे, वे प्रशासनिक नीतियों के चलते विधिक रूप से "विस्थापित" और भूमिहीन होने की कगार पर हैं। आक्रोशित किसानों ने प्रशासन के समक्ष अपनी ४ सूत्रीय विधिक मांगें रखी हैं:
- पुरखौती और अत्यधिक उपजाऊ कृषि भूमि को कौड़ियों के भाव विधिक रूप से छीनना तुरंत बंद हो।
- भूमि अधिग्रहण अधिनियम २०१३ के तहत ४ गुना उचित मुआवजा, विधिक पुनर्वास और रोजगार की गारंटी मिले।
- बिना विधिक जनसुनवाई और शत-प्रतिशत स्वैच्छिक सहमति के चल रही अधिग्रहण प्रक्रिया पर तत्काल विधिक रोक लगे।
- अन्नदाता को उसके विधिक अधिकारों से वंचित कर उजाड़ने के बजाय सम्मान से जीने का अधिकार दिया जाए।
निष्कर्ष: शासन-प्रशासन को यह विधिक आत्मचिंतन करना होगा कि किसानों के आंसुओं और उनकी विधिक आजीविका को उजाड़कर खड़े किए गए कंक्रीट के ढांचे कभी वास्तविक विकास नहीं कहला सकते। यदि यह विधिक अन्याय नहीं रुका, तो मऊ का किसान अपनी मेड़ से उजड़कर दर-दर भटकने को मजबूर होगा।
