हाईलाइट्स:
- फाइलों में कैद प्रस्ताव: सोबईबांध (NH-727 B) में उद्योग व रोजगार के लिए स्वेच्छा से दी गई 5.8 एकड़ भूमि का मामला डेढ़ साल से अटका।
- अधिकारियों पर अनदेखी का आरोप: SDM और जिला उद्योग केंद्र (DIC) की रिपोर्ट के बावजूद डीएम कार्यालय से कार्रवाई न होने का दावा।
- पलायन व कृषि संकट: औद्योगीकरण में देरी से स्थानीय युवाओं का पलायन जारी, मामले को लेकर महालेखाकार (PAG/CAG) तक पहुंची शिकायत।
बलिया : उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और युवाओं के पलायन को रोकने के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन को बलिया में प्रशासनिक स्तर पर ही अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। बलिया महायोजना 2031 के तहत उद्योग स्थापना और युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वेच्छा से ऑफर की गई 5.8 एकड़ भूमि का प्रस्ताव पिछले डेढ़ वर्ष से फाइलों में अटका हुआ है।
रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है सोबईबांध की भूमि
सुखपुरा थाना क्षेत्र के ग्राम सोबईबांध (NH-727 B पर स्थित) के भूमिदाताओं—प्रभात चंद्र, प्रमोद कुमार और मनोज कुमार त्रिवेदी ने बलिया महायोजना 2031, पारस्परिक सहमति नीति 2015 और यूपी राजस्व संहिता के तहत अपनी लगभग 5.8 एकड़ भूमि उद्योग व रोजगार सृजन के लिए विक्रय हेतु ऑफर की है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बलिया-बक्सर मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्गों से सीधी कनेक्टिविटी के कारण यह भूमि बिहार और पूर्वांचल के प्रमुख जिलों से जुड़ी हुई है, जिससे यह औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों के लिए बेहद उपयुक्त मानी जा रही है।
SDM और DIC की संस्तुति के बाद भी मामला लंबित
भूमिदाताओं का कहना है कि यह प्रस्ताव केवल कागजी नहीं है, बल्कि इसके समर्थन में SDM और जिला उद्योग केंद्र (DIC) की संस्तुति रिपोर्ट भी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है। आरोप है कि इसके बावजूद जिला प्रशासन स्तर पर इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया जा रहा है। बार-बार दिए गए प्रार्थना पत्रों और आईजीआरएस शिकायतों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। मामले में कोई पारदर्शी जवाब न मिलने पर पीड़ितों ने राज्य के राजकोष को होने वाली आर्थिक क्षति और नीतिगत विचलन को लेकर महालेखाकार (PAG / CAG) से भी पत्राचार किया है।
जनप्रतिनिधियों से भी नहीं मिली राहत
प्रस्ताव से जुड़े मनोज कुमार त्रिवेदी ने बताया कि उन्होंने इस पूरे प्रकरण से क्षेत्रीय विधायक व परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह को भी अवगत कराया था और सहयोग का अनुरोध किया था, लेकिन वहां से भी कोई ठोस और सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। स्थानीय स्तर पर उद्योग न लगने से क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के लिए बड़े शहरों की ओर रुख करना पड़ रहा है, वहीं किसानों के सामने भी आर्थिक विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।
