हाईलाइट्स:
- नाटकीय पटाक्षेप: बेदुआ बंधे पर शराब की दुकान हटाने को लेकर चल रहा 30 दिवसीय महाआंदोलन अचानक हुआ समाप्त।
- दिग्गजों की एंट्री: पूर्व मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला के पत्र और परिवहन मंत्री के भाई धर्मेंद्र सिंह के जूस पिलाने के बाद टूटना अनशन।
- जनता में सुगबुगाहट: दुकान हटी नहीं और मिल गया 2 महीने का आश्वासन, राजनीतिक नफे-नुकसान की भेंट चढ़ा आंदोलन?
बलिया (टुडे९ उत्तरप्रदेश): उत्तर प्रदेश के बलिया में पिछले एक महीने से बेदुआ बंधे पर स्थित देशी और अंग्रेजी शराब की दुकान को हटाने के लिए क्षेत्र की जनता जिस भारी आक्रोश के साथ सड़कों पर थी, वह आंदोलन अब पूरी तरह शांत हो चुका है। धरना प्रदर्शन, पुतला दहन और अंत में आमरण अनशन तक पहुंचे इस 30 दिवसीय महाआंदोलन का पटाक्षेप बेहद नाटकीय अंदाज में हुआ। बलिया के दो दिग्गज राजनीतिक चेहरों की एंट्री के साथ ही यह आंदोलन महज एक झटके में समाप्त हो गया, जिसने अब क्षेत्र में कई गंभीर राजनीतिक और सामाजिक सवालों को जन्म दे दिया है।
पूर्व मंत्री का मिला पत्र, फिर हुई मंत्री के भाई की 'जूस वाली एंट्री'
आंदोलन के तीसरे दिन जब प्रदर्शनकारी आमरण अनशन पर डटे हुए थे, तब पूर्व मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला ने जिलाधिकारी (DM) को एक पत्र लिखकर इस आंदोलन को जायज ठहराया और प्रशासन से तत्काल एक्शन लेने की मांग की। पूर्व मंत्री का यह कदम जैसे ही चर्चा में आया, वैसे ही अनशन के अगले दिन उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के भाई धर्मेंद्र सिंह की आंदोलन स्थल पर अचानक एंट्री हो गई।
धर्मेंद्र सिंह के साथ कोतवाल और चौकी इंचार्ज भी दलबल के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने अनशन पर बैठे लोगों को अपने हाथों से जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। इसके बाद जो आंदोलनकारी कल तक शराब की दुकान हटने पर पूरे इलाके को 'गंगाजल' से शुद्ध करने का दम भर रहे थे, उनके सुर अचानक बदले-बदले नजर आने लगे।
कल तक जो आर-पार के मूड में थे, आज उनके बदले सुर
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे गिरजा शंकर राय ने अचानक प्रशासन और नेताओं की भूमिका की सराहना शुरू कर दी।
"प्रशासन की बहुत अच्छी भूमिका रही। डीएम साहब ने हमें पहले ही आश्वस्त किया था कि वहां चखना नहीं बेचा जाएगा और कोई सरेआम शराब नहीं पिएगा। हम डीएम साहब, परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, उनके भाई धर्मेंद्र सिंह, कोतवाल और चौकी इंचार्ज का धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने आकर हमारा अनशन समाप्त कराया।"
जब नेतृत्वकर्ताओं से मीडिया ने तीखा सवाल किया कि क्या उनकी मुख्य मांग शराब की दुकान हटाने की थी या सिर्फ चखने की दुकान हटाने की? तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा, "हमारी मुख्य मांग शराब की दुकान हटाने की ही है और डीएम साहब इस पर काम कर रहे हैं। 40 साल से हमारा क्षेत्र इस शराबखाने की वजह से परेशान था। हमें प्रशासन ने डेढ़ से 2 महीने का समय दिया है। दुकान संचालक अपनी जमीन पर व्यवस्था करके इसे यहां से हटा लेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है, तो अधिकारियों ने कहा है कि हम दोबारा आंदोलन करने के लिए स्वतंत्र हैं।"
बड़ा सवाल: क्या सिर्फ कोरे आश्वासन पर राजनीति की भेंट चढ़ गया आंदोलन?
क्षेत्रीय जनता की साफ और एकलौती मांग थी कि जब तक शराब की दुकान यहां से पूरी तरह हट नहीं जाती, आंदोलन जारी रहेगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि 30 दिनों के लंबे संघर्ष और आमरण अनशन के बाद भी शराब की दुकान अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई है। जनता को हासिल हुआ है तो सिर्फ डेढ़ से दो महीने का एक और प्रशासनिक आश्वासन।
जिस आंदोलन को लेकर पूरे क्षेत्र में भारी उबाल था, वह बलिया के राजनीतिक दिग्गजों के दखल के बाद अचानक ठंडे बस्ते में चला गया। ऐसे में अब स्थानीय लोगों के बीच यह सुगबुगाहट बेहद तेज है कि क्या क्षेत्रवासियों की यह प्रमाणिक मांग और उनका एक महीने का संघर्ष राजनीतिक रसूख और नफे-नुकसान की भेंट चढ़ गया? क्या 2 महीने बाद वाकई यह शराब की दुकान हटेगी या यह जनता के आक्रोश को शांत करने का सिर्फ एक प्रशासनिक और राजनीतिक पैंतरा था? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
